उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi ghaalib jaanta hai koi KHaqani mujhe

कोई 'ग़ालिब' जानता है कोई 'ख़ाक़ानी' मुझे

کوئی غالبؔ جانتا ہے کوئی خاقانیؔ مجھے

शायर: Tahir Saood Kiratpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई 'ग़ालिब' जानता है कोई 'ख़ाक़ानी' मुझे
हाए दुनिया कैसे पहचानी जो पहचानी मुझे

तय किया है इक ग़ज़ल कहनी है रूमानी मुझे
और फिर सब शे'र भी कहने हैं ज़ू-मा'नी मुझे

जुगनुओं से चाहता हूँ शम्स जैसी रौशनी
महव-ए-हैरत देखती है मेरी नादानी मुझे

मैं ग़ज़ल से और ग़ज़ल रखती है मुझ से अपने दुख
रात की रानी को मैं हूँ रात की रानी मुझे

चाँद सूरज कर लिए तस्ख़ीर इस के बावजूद
हाए अब तक भी न आई चश्म-ए-गुल-ख़्वानी मुझे

जो हदीस-ए-‘इश्क़ उन आँखों में होती हैं रक़म
उन की 'ताहिर' किस तरह तफ़्सीर फ़रमानी मुझे