उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi bhi iKHtiyar achchha bura chalne nahin deta

कोई भी इख़्तियार अच्छा बुरा चलने नहीं देता

کوئی بھی اختیار اچھا برا چلنے نہیں دیتا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई भी इख़्तियार अच्छा बुरा चलने नहीं देता
वो सब ख़ुद कर रहा है और पता चलने नहीं देता

खड़ा हूँ और मिरे आगे रुकावट भी नहीं कोई
जो सच पूछें तो मुझ को रास्ता चलने नहीं देता

अँधेरा भी है पत्तों पर पसीना भी मगर उस ने
सहर रोकी हुई है और हवा चलने नहीं देता

कभी उठवा रहा है सारा सौदा ही दुकानों से
कभी बाज़ार में सिक्का मिरा चलने नहीं देता

वो ले कर चल रहा है सब को अपनी सरपरस्ती में
किसी को अपनी मर्ज़ी से जुदा चलने नहीं देता

बहुत कुछ बंद है और इस घड़ी कुछ कह नहीं सकते
कि चलने दे रहा है क्या तो क्या चलने नहीं देता

'ज़फ़र' ज़ंजीर मेरे पाँव में है मेरी अपनी ही
मुझे आगे मिरा रंग-ए-नवा चलने नहीं देता