उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi arman hi nahin paya

कोई अरमान ही नहीं पाया

کوئی ارمان ہی نہیں پایا

शायर: Aamir Azher7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई अरमान ही नहीं पाया
दिल परेशान ही नहीं पाया

ख़त्म होने लगे मिरे कर्तब
उन को हैरान ही नहीं पाया

सब की आँखें ख़रीद लीं उस ने
कोई पहचान ही नहीं पाया

ज़िंदगी तुझ को कितनी जल्दी थी
मैं तुझे जान ही नहीं पाया

कल मैं बैठा था कैसे लोगों में
ख़ुद को पहचान ही नहीं पाया

चादरों में लिपट गया वो शहर
चादरें तान ही नहीं पाया

मुझ को मज़लूम क्या समझते वो
मुझ को इंसान ही नहीं पाया