उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kiya hai din-dar us sanam ko hazaron tufan uTha-uTha kar

किया है दीं-दार उस सनम को हज़ारों तूफ़ाँ उठा-उठा कर

کیا ہے دیں دار اس صنم کو ہزاروں طوفاں اٹھا اٹھا کر

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किया है दीं-दार उस सनम को हज़ारों तूफ़ाँ उठा-उठा कर
लगाईं वो तोहमतें कि बोला ख़ुदा-ख़ुदा कर ख़ुदा-ख़ुदा कर

तिरी मोहब्बत ने मार डाला हज़ार ईज़ा से मुझ को ज़ालिम
रुला-रुला कर घुला-घुला कर जला-जला कर मिटा-मिटा कर

शराब-ख़ाना है ये तो ज़ाहिद तिलिस्म-ख़ाना नहीं जो टूटे
कि तौबा करते गई है तौबा अभी यहाँ से शिकस्त पा कर

निगह को बेबाकियाँ सिखाओ हिजाब-ए-शर्म-ओ-हया उठाओ
भुला के मारा तो ख़ाक मारा लगाओ चोटें जता-जता कर

न हर बशर का जमाल ऐसा न हर फ़रिश्ते का हाल ऐसा
कुछ और से और हो गया तू मिरी नज़र में समा-समा कर

इलाही क़ासिद की ख़ैर गुज़रे कि आज कूचे से फ़ित्ना-गर के
सबा निकलती है लड़खड़ा कर नसीम चलती है थरथरा कर

जनाब-ए-सुल्तान-ए-इश्क़ वो है करे जो ऐ 'दाग़' इक इशारा
फ़रिश्ते हाज़िर हों दस्त-बस्ता अदब से गर्दन झुका झुका कर