उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kitne aazar muqaddar se lage rahte hain

कितने आज़ार मुक़द्दर से लगे रहते हैं

کتنے آزار مقدر سے لگے رہتے ہیں

शायर: Yahya Khan Yusuf Zai6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कितने आज़ार मुक़द्दर से लगे रहते हैं
तेरे बीमार तो बिस्तर से लगे रहते हैं

कभी तुझ बाला-नशीं को भी ख़बर पहुँचेगी
कितने सर हैं जो तिरे दर से लगे रहते हैं

शाम होती है तो काम और भी बढ़ जाता है
अन-गिनत यादों के दफ़्तर से लगे रहते हैं

तेरी फ़ुर्क़त में किसे जादा-ओ-मंज़िल का दिमाग़
ग़म के मारे किसी पत्थर से लगे रहते हैं

हम भुला देंगे ज़माने का चलन भी लेकिन
शीशा-ए-दिल पे जो पत्थर से लगे रहते हैं

आज भी कूचा-ए-जानाँ की वही रौनक़ है
अब भी कुछ लोग बराबर से लगे रहते हैं