उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ne abhi mujhko mana nahin

किसी ने अभी मुझ को माना नहीं

کسی نے ابھی مجھ کو مانا نہیں

शायर: Jaleel Qidwai10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी ने अभी मुझ को माना नहीं
मिरा साथ देता ज़माना नहीं

किसी रोज़ चमकेंगे जौहर मिरे
अभी मुझ को दुनिया ने जाना नहीं

मिरी शायरी है तक़ाज़ा-ए-ज़ौक़
मुझे ज़ोर-ए-फ़न आज़माना नहीं

मुझे ख़ल्क़ के दिल में करना है घर
फ़क़त रंग अपना जमाना नहीं

जो कहता हूँ मैं दिल की है वारदात
ये कुछ शायरी या फ़साना नहीं

ज़माना हुआ मुझ को जीते हुए
सबब मैं ने जीने का जाना नहीं

सुझाया तो मैं ने बहुत नेक-ओ-बद
ये दिल मेरा कम्बख़्त माना नहीं

मिरे दिल ने खाई हैं चोटें बहुत
तुम अब और इस को दुखाना नहीं

नहीं है वो दिल है कोई और शय
अगर तीर-ए-ग़म का निशाना नहीं

मैं हँसता रहा ज़िंदगी-भर 'जलील'
किसी ने मिरा दर्द जाना नहीं