उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ke hath mein gul hai kisi ke patthar hai

किसी के हाथ में गुल है किसी के पत्थर है

کسی کے ہاتھ میں گل ہے کسی کے پتھر ہے

शायर: Qamar Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी के हाथ में गुल है किसी के पत्थर है
हमारे चारों तरफ़ इक 'अजीब मंज़र है

वो हम से मिलने को आया है दोस्तों की तरह
मगर छुपाए हुए आस्तीं में ख़ंजर है

कुलाह रखने से पहले कोई भी ख़ौफ़ न था
अमीर-ए-शहर की नज़रों में अब मिरा सर है

हर एक क़त्ल का इल्ज़ाम मेरे सर आया
कि ख़ूँ-बहा ही चुकाना मिरा मुक़द्दर है

मैं ख़ुद-परस्ती के नश्शे में चूर हूँ लेकिन
तुम्हारे शहर का हर शख़्स मुझ से बेहतर है

मैं शाम होते ही सूरज के साथ डूब न जाऊँ
बचूँ में कैसे कि ये ख़ौफ़ मेरे अंदर है

मुक़ाबले के लिए उस के किस तरह जाऊँ
कि मेरे पीछे खड़ा बुज़दिलों का लश्कर है

मैं जिस के साए तले ज़ख़्म सी रहा हूँ 'क़मर'
उसी दरख़्त पे बैठा हुआ कबूतर है