उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ka ghar nahin dekha koi rishta nahin dekha

किसी का घर नहीं देखा कोई रिश्ता नहीं देखा

کسی کا گھر نہیں دیکھا کوئی رشتہ نہیں دیکھا

शायर: Habiba Ikram6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी का घर नहीं देखा कोई रिश्ता नहीं देखा
हवस की आग ने बच्चा हो या बूढ़ा नहीं देखा

जिसे हम ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में गँवा बैठे हैं मुद्दत से
दुबारा चाह कर भी अपना वो क़िबला नहीं देखा

जो क़ुर्बां हो गया इक ख़्वाब की तकमील की ख़ातिर
किसी ने फिर कभी ऐसा कोई बेटा नहीं देखा

न जाने कितने कमसिन हैं यहाँ एहसास के मारे
जिन्हों ने आज तक इस्कूल का बस्ता नहीं देखा

महकता है शबिस्तान-ए-वजूद अपना ज़माने से
मैं क्या हूँ कौन हूँ तुम ने मिरा शजरा नहीं देखा

वो क्या जानें किसे बाला-क़दी कहते हैं दुनिया में
जिन्हों ने अपने क़द से आज तक ऊँचा नहीं देखा