उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis tarah ki ye tak hai aur jhank

किस तरह की ये ताक है और झाँक

کس طرح کی یہ تاک ہے اور جھانک

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस तरह की ये ताक है और झाँक
देखने से बिखर रही है आँख

कुछ हिजाब-ओ-हया भी चाहिए है
छातियाँ खोल दी हैं सर तो ढाँक

शोर इतना बपा था हर जानिब
'इश्क़ निकला है सिर्फ़ एक छटाँक

सेब-ए-रुख़्सार का जो है चर्चा
कहीं अपने लिए भी है कोई फाँक

वाह-रे क़ाफ़िए की मजबूरी
कि अचानक भी हो रहा है अचाँक

आसमानों पे जा के फूल खिला
और इस ख़ाक पर सितारे टाँक

दूर है सब्ज़ा-गाह-ए-मा’नी अभी
और अल्फ़ाज़ का ये रेवड़ हाँक

जो भी हो एक ही असर है 'ज़फ़र'
बोसा मिलता नहीं तो ज़ह्र ही फाँक