उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kiran kiran mera suraj hai raushni ke baghair

किरन किरन मिरा सूरज है रौशनी के बग़ैर

کرن کرن مرا سورج ہے روشنی کے بغیر

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किरन किरन मिरा सूरज है रौशनी के बग़ैर
यही बहुत है कि ज़िंदा हूँ ज़िंदगी के बग़ैर

धड़क रहा हूँ पड़ा अपने दिल से दूर कहीं
भटक रहा है मिरा शे'र शा'इरी के बग़ैर

मैं एक 'उम्र से रोता हूँ रंज से हट कर
कभी-कभार जो हँसता हूँ गुदगुदी के बग़ैर

जुड़ी हो जैसे हर इक दिन के साथ रात यहाँ
जहाँ-तहाँ कोई नेकी नहीं बदी के बग़ैर

सभी ने देख लिया इस दफ़'अ तो महफ़िल में
जमा नहीं कोई रंग उस की सादगी के बग़ैर

उड़ाए फिरती है क्या अपने साथ साथ मुझे
सो मैं भी रह नहीं सकता हूँ उस परी के बग़ैर

ज़ियादा फ़र्क़ नहीं नफ़रत और मोहब्बत में
न दोस्ती कोई मुमकिन है दुश्मनी के बग़ैर

ख़िलाफ़-ए-क़ा'एदा होता हूँ आज कल तो 'ज़फ़र'
कभी किसी के बग़ैर और कभी किसी के बग़ैर