उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwabon ke kisi moD pe dekha sa lage hai

ख़्वाबों के किसी मोड़ पे देखा सा लगे है

خوابوں کے کسی موڑ پہ دیکھا سا لگے ہے

शायर: Qaisarul Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाबों के किसी मोड़ पे देखा सा लगे है
अपना न सही फिर भी वो अपना सा लगे है

ऐ शिद्दत-ए-गिर्या कहीं दिल डूब न जाए
ये दर्द का लम्हा मुझे दरिया सा लगे है

जिस मोड़ पे बिछड़े थे हमेशा के लिए हम
दिल है कि उसी मोड़ पे ठहरा सा लगे है

आँखों में बसी है कोई खोई हुई ख़ुशबू
जिस फूल को देखो वही चेहरा सा लगे है

बरसों से किसी के लिए रोए भी नहीं हम
क्यों ज़ख़्म-ए-तमन्ना है कि ताज़ा सा लगे है

तुम डूबते सूरज के लिए रोओ हो 'क़ैसर'
कुछ देर में साया भी बिछड़ता सा लगे है