उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwabida lahu jaga phir azm ke shanon mein

ख़्वाबीदा लहू जागा फिर 'अज़्म के शानों में

خوابیدہ لہو جاگا پھر عزم کے شانوں میں

शायर: Sabiha Sumbul6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाबीदा लहू जागा फिर 'अज़्म के शानों में
फिर चढ़ने लगे नावक इन उतरी कमानों में

बनते हैं जो दीवाने बनने दो उन्हें लोगो
रोए भी तो कितने हैं ये गुज़रे ज़मानों में

मुमकिन है कि हाथ आएँ ता'बीर के कुछ सिक्के
ख़्वाबों की तिजारत कर आँखों की दुकानों में

गुलशन की कहानी के किरदार तो हम भी हैं
हो ज़िक्र हमारा भी इन ताज़ा फ़सानों में

दो इतनी बुलंदी तुम अख़्लाक़ की क़द्रों को
ज़ुन्नार भी शामिल हो तस्बीह के दानों में

किस तरह मिरे घर पर पत्थर वो उछालेंगे
रहते हों जो ख़ुद 'सुम्बुल' शीशे के मकानों में