उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHun mera jis se hua hai KHanjar-e-ahbab hai

ख़ूँ मिरा जिस से हुआ है ख़ंजर-ए-अहबाब है

خوں مرا جس سے ہوا ہے خنجر احباب ہے

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ूँ मिरा जिस से हुआ है ख़ंजर-ए-अहबाब है
ये हक़ीक़त है मगर लगता है जैसे ख़्वाब है

इस लिए मुझ सा नुमायाँ हो गया बे-बाल-ओ-पर
जिस जगह मैं हूँ वहाँ हर आदमी सुरख़ाब है

हम ने देखा है कि अक्सर डूब जाता है वही
जो तलाश-ए-गौहर-ए-यकता में ज़ेर-ए-आब है

अब किसी जंगल में जा रहिए कि अपने शहर में
आदमी ही आदमी के वास्ते नायाब है

ज़िंदगी अपनी बिल-आख़िर हो गई उस पर तमाम
जो किताब-ए-ज़िंदगी का ना-मुकम्मल बाब है

वो तो ये कहिए शिकस्ता हो चुका है हौसला
वर्ना दिल अब भी किसी के वस्ल को बेताब है