उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHub hi chalti hui wo nargis-e-mastana hai

ख़ूब ही चलती हुई वो नर्गिस-ए-मस्ताना है

خوب ہی چلتی ہوئی وہ نرگس مستانہ ہے

शायर: Dagh Dehlvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ूब ही चलती हुई वो नर्गिस-ए-मस्ताना है
आश्ना से आश्ना बेगाने से बेगाना है

आते जाते हैं नए हर रोज़ मुर्ग़-ए-नामा-बर
बंदा-पर्वर आप का घर भी कबूतर-ख़ाना है

फ़ातिहा पढ़ने को आया था मगर वो शम्अ'-रू
आज मेरी क़ब्र का जो फूल है परवाना है

पा-ए-साक़ी पर गिराया जब गिराया है मुझे
चाल से ख़ाली कहाँ ये लग़्ज़िश-ए-मस्ताना है

मुझ को ले जा कर कहा नासेह ने उन के रू-ब-रू
आप के सर की क़सम ये आप का दीवाना है

'दाग़' ये है कू-ए-क़ातिल मान नादाँ ज़िद न कर
उठ यहाँ से आ इधर घर बैठ कुछ दीवाना है