उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHushk aankhon ki kahani dasht dasht apni hi thi

ख़ुश्क आँखों की कहानी दश्त दश्त अपनी ही थी

خشک آنکھوں کی کہانی دشت دشت اپنی ہی تھی

शायर: Parwez Rahmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुश्क आँखों की कहानी दश्त दश्त अपनी ही थी
नम हवाओं में सदा-ए-बाज़गश्त अपनी ही थी

ढूँडते फिरते रहे थे साया साया ज़िंदगी
धूप की गलियों में सुब्ह-ओ-शाम गश्त अपनी ही थी

जागती रहती थीं आँखें ख़ाना ख़ाना ख़ौफ़ ख़ौफ़
ख़्वाब की रौशन-नुमाई तश्त तश्त अपनी ही थी

जंगलों से शहर तक शाना-ब-शाना पुश्त पुश्त
सिलसिला करती हुई वो सर-गुज़श्त अपनी ही थी

मेरी ख़ुश-तबई न थी रू-ए-ग़रीब-ए-शहर हाँ
शहर-यारों में मुज़व्वज ख़ू-ए-ज़श्त अपनी ही थी

करते थे 'परवेज़' 'रहमानी' उजाले गुल-कशीद
शब-गिरफ़्ता वादियों में ख़ार-गश्त अपनी ही थी