उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHushi mili to ye aalam tha bad-hawasi ka

ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का

خوشی ملی تو یہ عالم تھا بدحواسی کا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का
कि ध्यान ही न रहा ग़म की बे-लिबासी का

चमक उठे हैं जो दिल के कलस यहाँ से अभी
गुज़र हुआ है ख़यालों की देव-दासी का

गुज़र न जा यूँही रुख़ फेर कर सलाम तो ले
हमें तो देर से दावा है रू-शनासी का

ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा
कोई इलाज नहीं आज की उदासी का

गिरे पड़े हुए पत्तों में शहर ढूँडता है
अजीब तौर है इस जंगलों के बासी का