उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHushbuon ka shahr ujDa ghar se be-ghar ho gae

ख़ुशबुओं का शहर उजड़ा घर से बे-घर हो गए

خوشبوؤں کا شہر اجڑا گھر سے بے گھر ہو گئے

शायर: Parwez Rahmani5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुशबुओं का शहर उजड़ा घर से बे-घर हो गए
बादशाहत हाथ से निकली गदागर हो गए

तीरगी में जा पड़े रौशन तक़ाज़े सुब्ह के
झूट सच्चे थे जभी लोगों को अज़बर हो गए

जितने अर्से हम रहे ख़ुद-सर अना के ज़ेर-ए-पा
ज़र्रे सूरज बन गए क़तरे समुंदर हो गए

था क़ुसूर अपना यही बस आइना शाने पे था
चेहरे क्या उभरे सभी आपे से बाहर हो गए

जाने किस की बद-दुआ' 'परवेज़'-रहमानी लगी
देखते ही देखते अहबाब पत्थर हो गए