उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko KHudi ka aaina dikhla raha hun main

ख़ुद को ख़ुदी का आइना दिखला रहा हूँ मैं

خود کو خودی کا آئنہ دکھلا رہا ہوں میں

शायर: Baldev Raaj10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को ख़ुदी का आइना दिखला रहा हूँ मैं
अपना हरीफ़ आप बना जा रहा हूँ मैं

क़िस्मत की पस्तियों की हदें ख़त्म हो चुकीं
अब रिफ़अ'तों की सम्त उड़ा जा रहा हूँ मैं

नाकाम-ए-आरज़ू हूँ मगर उफ़ यक़ीन-ए-इश्क़
दानिस्ता फिर फ़रेब-ए-वफ़ा खा रहा हूँ

मोहर-ए-सुकूत-ए-लब पे है बहके हुए क़दम
ऐ बे-ख़ुदी फिर आज किधर जा रहा हूँ मैं

फिर देखता हूँ चेहरा-ए-माज़ी के ख़द्द-ओ-ख़ाल
साक़ी सँभाल होश में फिर आ रहा हूँ मैं

रुक जाए जिस के शोर से दश्त-ओ-जबल की साँस
उस सैल-ए-रंज-ओ-ग़म में बहा जा रहा हूँ मैं

जाने को हूँ अहाता-ए-आलम से दूर-तर
बस चंद रोज़ तुम को नज़र आ रहा हूँ मैं

शम्स-ओ-क़मर हैं राह में ज़र्रात की तरह
किस की तजल्लियों में घिरा जा रहा हूँ मैं

था जो ख़याल तेरी जफ़ाओं से पेशतर
दिल को उसी ख़याल से बहला रहा हूँ मैं

बढ़ बढ़ के 'राज' मेरे क़दम ले रही है मौत
किस ज़िंदगी की सम्त बढ़ा जा रहा हूँ मैं