उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gardish mein hai zamin bhi kya aasman ke sath

गर्दिश में है ज़मीन भी क्या आसमाँ के साथ

گردش میں ہے زمین بھی کیا آسماں کے ساتھ

शायर: Baldev Raaj9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गर्दिश में है ज़मीन भी क्या आसमाँ के साथ
दुनिया बदल गई निगह-ए-मेहरबाँ के साथ

दोहराना अंजुमन में समझ सोच के उसे
तेरी भी दास्ताँ है मिरी दास्ताँ के साथ

अब मैं हूँ और कुंज-ए-क़फ़स की मुसीबतें
वो आशियाँ की बात गई आशियाँ के साथ

बेताबियों से रब्त था बेचैनियों से काम
गुज़रे हैं ऐसे दिन भी उस आराम-जाँ के साथ

रोज़-ए-अज़ल वही तो फ़क़त मुस्तहिक़ न था
कुछ गर्दिशें हमें भी मिलीं आसमाँ के साथ

ग़म को तिरे भुला न सका दो-जहाँ का ग़म
तेरा भी ग़म रहा है ग़म-ए-दो-जहाँ के साथ

उम्मीद ही नहीं तो गुज़र जाएगी यूँही
इक मेहरबाँ के साथ कि ना-मेहरबाँ के साथ

ये सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़ ग़म-ए-जावेदाँ सही
दे उम्र-ए-जावेदाँ भी ग़म-ए-जावेदाँ के साथ

मंज़िल का क्या यक़ीं हो बताए कोई मुझे
जब रहगुज़ार भी है रवाँ कारवाँ के साथ