उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaj hai isar ka jazba jo parwanon ke pas

आज है ईसार का जज़्बा जो परवानों के पास

آج ہے ایثار کا جذبہ جو پروانوں کے پاس

शायर: Baldev Raaj11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आज है ईसार का जज़्बा जो परवानों के पास
थी कभी ये दौलत-ए-बेदार इंसानों के पास

'अक़्ल है इक आस्तीं का साँप फ़र्ज़ानों के पास
बे-ख़ुदी कितनी बड़ी दौलत है दीवानों के पास

किस की है दुनिया ये आख़िर साहब-ए-ख़ाना है कौन
मेज़बाँ देखा नहीं कोई भी मेहमानों के पास

अज़्मत-ए-दीवानगी का शोर फ़र्ज़ानों में है
है ग़नीमत ये भी रह जाए जो दीवानों के पास

शम' रौशन हो गई आ जाओ जलने के लिए
ये ख़बर जाता है ले कर कौन परवानों के पास

गाहे आबादी के सीने तक चले आते हैं दश्त
गाहे आबादी पहुँच जाती है वीरानों के पास

अश्क-ए-हसरत सोज़-ए-ग़म दर्द-ए-मोहब्बत दाग़-ए-दिल
क्या नहीं सब कुछ है तेरे ख़स्ता सामानों के पास

तुम न गर आते तो खिंच जाते सनम-ख़ाने वहीं
तुम ने ख़ुद तौहीन की आ कर सनम-ख़ानों के पास

नाख़ुदा कश्ती के रुख़ को मोड़ लंगर काट दे
मुझ को साहिल सा नज़र आता है तूफ़ानों के पास

देखें अब बेगाने करते हैं इशारा किस तरफ़
मुझ को अपनों ने तो पहुँचाया है बेगानों के पास

'राज' जाने किस तरह करते हैं सज्दे बरहमन
मैं तो बन जाता हूँ बुत जा कर सनम-ख़ानों के पास