उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek zarre se hai tabani-e-shams-o-qamar paida

हर इक ज़र्रे से है ताबानी-ए-शम्स-ओ-क़मर पैदा

ہر اک ذرے سے ہے تابانیٔ شمس و قمر پیدا

शायर: Baldev Raaj6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर इक ज़र्रे से है ताबानी-ए-शम्स-ओ-क़मर पैदा
हर इक आईने से है सूरत-ए-आईना-गर पैदा

ज़माना बंद कर देता है जिस पर इक दर-ए-इशरत
तो इस के वास्ते करती है फ़ितरत लाख दर पैदा

गदाओं की नज़र में ख़ाक है तौक़ीर-ए-सुल्तानी
फ़ुसून-ए-इश्क़ कर देता है ज़र्रों में नज़र पैदा

नहीं कुछ दूर ये भी सूरमा क़ौमों की फ़ितरत से
शिकस्तें खा के भी कर लेते हैं फ़त्ह-ओ-ज़फ़र पैदा

जुनूँ को चाहिएँ बे-ख़ौफ़-ओ-आ'ली-ज़र्फ़ दीवाने
हर इक दीवार में ज़िंदाँ की हो सकते हैं दर पैदा

हक़ीक़त में ख़िज़ाँ ता'मीर है फ़स्ल-ए-बहारी की
कि दर्द-ए-सर से होती है दवा-ए-दर्द-ए-सर पैदा