उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko jab tere muqabil paya

ख़ुद को जब तेरे मुक़ाबिल पाया

خود کو جب تیرے مقابل پایا

शायर: Parveen Fana Syed5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को जब तेरे मुक़ाबिल पाया
अपनी पहचान का लम्हा आया

अक्स-दर-अक्स थे रंगों के चराग़
मैं ने मिट्टी का दिया अपनाया

एक पल एक सदी पर भारी
सोच पर ऐसा भी लम्हा आया

पाँव छलनी तो वफ़ा घाइल थी
जाने उस मोड़ पे क्या याद आया

एक लम्हे के तबस्सुम का फ़ुसूँ
जाँ से गुज़रे तो समझ में आया