उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHol ke andar simaT kar rah gaya main

ख़ोल के अंदर सिमट कर रह गया मैं

خول کے اندر سمٹ کر رہ گیا میں

शायर: Chandrabhan Khayal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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ख़ोल के अंदर सिमट कर रह गया मैं
अपनी साए से भी कट कर रह गया मैं

ले गया वो छीन कर मेरी जवानी
उस पे बस यूँ ही झपट कर रह गया मैं

जब कभी निकला जुलूस-ए-रंग-ओ-निकहत
टूटी दीवारों से सट कर रह गया मैं

चल रहा था वो मेरे शाना-ब-शाना
ख़ुद ही उस से दूर हट कर रह गया मैं

उस ने मिट्टी भर मुझे ऊँचा किया जब
और भी इक हाथ घट कर रह गया मैं

चाह थी घुल जाओ सारे मंज़रों में
हैफ़ कुछ लोगों में बट कर रह गया मैं

बारहा ऐसा हुआ महसूस जैसे
आसमानों से लिपट कर रह गया मैं