उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHayal-o-KHwab ban ke mere zehn se lipaT gae

ख़याल-ओ-ख़्वाब बन के मेरे ज़ेहन से लिपट गए

خیال و خواب بن کے میرے ذہن سے لپٹ گئے

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़याल-ओ-ख़्वाब बन के मेरे ज़ेहन से लिपट गए
वो इतनी दूर हो गए कि फ़ासले सिमट गए

सबा हमें तलाश कर के ज़ख़्म-ज़ख़्म हो गई
सुना है ख़ुशबुओं के सारे क़ाफ़िले पलट गए

त'अल्लुक़ात का सफ़र है और तेज़ धूप है
रफ़ाक़तों के रास्ते के सारे पेड़ कट गए

ख़राब मौसमों के शोर में ख़ुलूस बह गया
जो नाख़ुदा बने थे अपनी नाव ले के हट गए

ख़ला में अब बदन सँभालते रहो तमाम उम्र
कि हादसे तो पाँव की ज़मीन ले के हट गए

अधूरी ज़िंदगी को अब लिए फिरें कहाँ कहाँ
किताब-ए-दिल से उस के नाम के वर्क़ तो फट गए

वो आँख भर के अपने दाग़ देखता न देखता
ये आइनों को क्या हुआ कि सामने से हट गए

नई सदी सलाम करने आ रही थी 'जाफ़री'
चराग़ फेंक कर हमीं गुफाओं में पलट गए