उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHauf ke zahrile phan hain hausle ke aas-pas

ख़ौफ़ के ज़हरीले फन हैं हौसले के आस-पास

خوف کے زہریلے پھن ہیں حوصلے کے آس پاس

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ौफ़ के ज़हरीले फन हैं हौसले के आस-पास
या'नी नुक़्सानात भी हैं फ़ाएदे के आस-पास

यूँ अंधेरे की सलाख़ों से हुआ आज़ाद दीप
चंद जुगनू रख दिए हम ने दिए के आस-पास

मर के भी हमसायगी बाक़ी रहे सो इक दरख़्त
तुम लगा देना हमारे मक़बरे के आस-पास

क्या ज़माना है दिलों को तोड़ कर भी आदमी
मुस्कुराता फिर रहा है आइने के आस-पास

इक ग़ज़ल की यक-ब-यक तक़दीर रौशन हो गई
इक ग़ज़ल रोती रही बंजर गले के आस-पास

मैं ने उन की सिर्फ़ इक तस्वीर खींची थी कि बस
तितलियाँ ही तितलियाँ थीं कैमरे के आस-पास

एक शब इक रौशनी ने ख़्वाब में आ कर कहा
बा-वज़ू बैठा करो रोते हुए के आस-पास