उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kashtiyon ke khilkhilate baadbanon ki tarah

कश्तियों के खिलखिलाते बादबानों की तरह

کشتیوں کے کھلکھلاتے بادبانوں کی طرح

शायर: Tafzeel Ahmad6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कश्तियों के खिलखिलाते बादबानों की तरह
रात भर उगते हैं चेहरे गुम ख़ज़ानों की तरह

हो न हिर-फिर सैर-ए-गुल को जा रही है फ़ाख़्ता
फिर हवा चलने लगी है नौजवानों की तरह

बारहा जो मुझ से टकराती है मेरी गूँज है
मैं भी ख़ुश-आबाद हूँ ख़ाली मकानों की तरह

जम्अ है कूज़े सा मुझ में उम्र भर का शोर-ओ-ग़ुल
लग रहे हैं ज़ेहन-ओ-दिल नक़्क़ार-ख़ानों की तरह

मुझ को सीपी सा ढके रहता है मिट्टी पर फ़लक
हश्र में निकलूँ कहीं मोती के दानों की तरह

ज़ाफ़रान-ए-फ़न बनेगा विर्सा-ए-उर्दू मिरा
मैं ने भी अल्फ़ाज़ बोए हैं किसानों की तरह