उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kashti-hawas hawaon ke ruKH par utar de

कश्ती-हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे

کشتی ہوس ہواؤں کے رخ پر اتار دے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कश्ती-हवस हवाओं के रुख़ पर उतार दे
खोए होऊँ से मिल ये दलद्दर उतार दे

बे-सम्त की उड़ान है शोख़ी शबाब की
उस छत पे आज तू ये कबूतर उतार दे

मैं इतना बद-मआ'श नहीं या'नी खुल के बैठ
चुभने लगी है धूप स्वेटर उतार दे

दिन-रात यूँ न ख़ौफ़ का गट्ठर उठाए फिर
ये बोझ अपने सर से झटक कर उतार दे

उस की ही आब-ओ-ताब से रौशन हो रेग-ए-दिल
ये तेग़ मेरे सीने के अंदर उतार दे

चेहरे से झाड़ पिछले बरस की कुदूरतें
दीवार से पुराना कैलेंडर उतार दे

ये बात ज़र्फ़ की नहीं है मावरा-ए-ज़र्फ़
चाहे तो इस कुएँ में समुंदर उतार दे

लोगों के साथ मेरी लड़ाई है आज-कल
बेहतर है मुझ को शहर से बाहर उतार दे

तू ख़ुद तो सात पर्दों में मस्तूर है 'ज़फ़र'
मल्बूस तेरे आगे वो क्यूँकर उतार दे