उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kar chuka phul main jab sare jahan ke patthar

कर चुका फूल मैं जब सारे जहाँ के पत्थर

کر چکا پھول میں جب سارے جہاں کے پتھر

शायर: Aabid Jafri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कर चुका फूल मैं जब सारे जहाँ के पत्थर
आ पड़े सर पे मिरे जाने कहाँ के पत्थर

ज़र्फ़-ए-दिल में नमी-ए-अश्क-ए-हक़ीक़त न रही
इतने बख़्शे हमें लोगों ने गुमाँ के पत्थर

प-ए-हक़ दर-पए-पैकार कोई मिलता नहीं
बंध गए पाँव से क्या वहशत-ए-जाँ के पत्थर

ख़ाक में मिल गए सब फूल से लोगों के वजूद
लग गए क़ब्र पे बस नाम-ओ-निशाँ के पत्थर

कू-ब-कू हो गईं ता'मीर इबादत-गाहें
जम्अ करते ही रहे हम तो मकाँ के पत्थर

ज़िंदगी के लिए गौहर वही ठहरे 'आबिद'
लोग कहते हैं जिन्हें फ़िक्र-ए-जवाँ के पत्थर