उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kamre mein ho muDbheD ki zine pe mulaqat

कमरे में हो मुडभेड़ कि ज़ीने पे मुलाक़ात

کمرے میں ہو مڈبھیڑ کہ زینے پہ ملاقات

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कमरे में हो मुडभेड़ कि ज़ीने पे मुलाक़ात
सहता हूँ मैं उस शोख़ की सीने पे मुलाक़ात

पानी सा झलकता हुआ आग़ाज़ में हर सू
होती है जो अंजाम पसीने पे मुलाक़ात

मिलना है ये किस तरह का मिलना कि यहाँ पर
होती है बिछड़ने के क़रीने पे मुलाक़ात

बस इतना ही अफ़्साना है इस हम-सफ़री का
साहिल पे जुदाई थी सफ़ीने पे मुलाक़ात

कुछ हम भी रहे अपने शब-ओ-रोज़ में मसरूफ़
कुछ टाल दी उस ने भी महीने पे मुलाक़ात

होती है किसी रोज़ सर-ए-राह तो हो जाए
रक्खी है न मरने पे न जीने पे मुलाक़ात

इक 'उम्र ही गुज़री है 'ज़फ़र' होती है अब तो
खाने पे मुलाक़ात न पीने पे मुलाक़ात