उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaisi ruki hui thi rawani meri taraf

कैसी रुकी हुई थी रवानी मिरी तरफ़

کیسی رکی ہوئی تھی روانی مری طرف

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसी रुकी हुई थी रवानी मिरी तरफ़
ठहरा हुआ था अपना ही पानी मिरी तरफ़

तहरीर में भी जो वो मिसाल अपनी आप है
पैग़ाम भेजता है ज़बानी मिरी तरफ़

पत्तों का रंग था कि हुआ और भी हरा
चलती रही हवा-ए-ख़िज़ानी मिरी तरफ़

है कोई आसमान में जिस की तरफ़ से रोज़
आती है एक याद-दहानी मिरी तरफ़

लफ़्ज़ों का बोझ रहता है सर पर शबाना रोज़
रहती है गुफ़्तुगू की गिरानी मिरी तरफ़

किरदार उस को ढूँडते फिरते हैं जा-ब-जा
गुम आ के हो गई है कहानी मिरी तरफ़

थे उस की दस्तरस में अजाइब तो बेश-तर
भेजी न उस ने कोई निशानी मिरी तरफ़

रहता है लफ़्ज़ लफ़्ज़ कोई शोर मुझ से दूर
करती है ज़ोर मौज-ए-मआ'नी मिरी तरफ़

जब कोई भी नहीं है तो फिर रात भर 'ज़फ़र'
होता है कौन आके बयानी मिरी तरफ़