उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaisi haar thi kaisi jit aur kya chhaggi par satta

कैसी हार थी कैसी जीत और क्या छग्गी पर सत्ता

کیسی ہار تھی کیسی جیت اور کیا چھگی پر ستہ

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसी हार थी कैसी जीत और क्या छग्गी पर सत्ता
तुंद हवा की लहर उड़ा कर ले गई पत्ता पत्ता

तन भी नंगा मन भी नंगा सूरज भी है सख़्त
धूप की चादर दे कर कोई ले गया कपड़ा-लत्ता

आसमान पर चढ़ी हुई बादल बरसात पतंग
और सड़क पर पड़ा हुआ पीपल का पीला पत्ता

मैं कंकर था किस ने मुझे चलाया ज़ोर से इतने
आन की आन में कैसा बिखरा ज़र्द भिड़ों का छत्ता

लैस थी सारी फ़ौज तग़ज़्ज़ुल के सब हथियारों से
जिस के मुक़ाबिल लड़ने वाला तन्हा और निहत्ता

ख़त्म हुआ पेट्रोल तो आख़िर रुकी शे'र की गाड़ी
टंकी में ये एक क़ाफ़िया बाक़ी था अलबत्ता