उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaise nazar aae kahin imkan hamara

कैसे नज़र आए कहीं इम्कान हमारा

کیسے نظر آئے کہیں امکان ہمارا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कैसे नज़र आए कहीं इम्कान हमारा
जब डोलता ही रहता है ईमान हमारा

नाकाम रहे हैं जो हमेशा की तरह हम
बदला है इरादा भी तो हर आन हमारा

पैग़ाम दिया फिर कभी ज़हमत न करें हम
और साथ ही भिजवा दिया सामान हमारा

हर बार हमारी ही डुबोता हुआ कश्ती
ये ज़ोर पकड़ता हुआ तूफ़ान हमारा

जो फ़ाएदा होना था उसी से हुए महरूम
कुछ इससे ज़ियादा नहीं नुक़्सान हमारा

कम होती गई अपनी तवज्जोह भी कुछ आख़िर
कुछ काम भी होता गया आसान हमारा

अपनी ही 'ज़फ़र' ख़ाक उड़ाते हैं शब-ओ-रोज़
हम पर भी हुआ तंग बयाबान हमारा