उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahun kis se ki dhundlae hue hain

कहूँ किस से कि धुँदलाए हुए हैं

کہوں کس سے کہ دھندلائے ہوئے ہیں

शायर: Aarif Nazeer14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहूँ किस से कि धुँदलाए हुए हैं
जो मंज़र आँख पर छाए हुए हैं

किनारे से किनारे तक है वहशत
नदी के राग घबराए हुए हैं

कुछ ऐसे ख़्वाब जिन से डर रहा हूँ
गुज़िश्ता रात से आए हुए हैं

कभी तू भी हमारी सम्त आता
तिरी जानिब तो हम आए हुए हैं

ख़ुलूस-ए-दिल सही तेरा तबस्सुम
मगर हम चोट तो खाए हुए हैं

न-जाने रात कौन आएगा छत पर
सितारे शाम से आए हुए हैं

मुक़द्दस हम सहीफ़े हैं जो शायद
हज़ारों बार झुटलाए हुए हैं

हमारा ज़िक्र हो तो जान लीजो
तिरी महफ़िल में हम आए हुए हैं

बड़े दाना हैं जी दुश्मन हमारे
मगर ज़िद पर अभी आए हुए हैं

रक़ीबों पर भी है नज़र-ए-‘इनायत
करम हम पर भी फ़रमाए हुए हैं

हमारा बन के तू भी तो रहा था
तिरे हम भी कभी हाए हुए हैं

सुकून-ओ-अम्न वक़्ती ही रहा है
मुसलसल ख़ौफ़ के साए हुए हैं

दिमाग़ी 'आरिज़ा लाहक़ है तुम को
कई दिल हैं जो घबराए हुए हैं

हमें 'आरिफ़' गुलों से निस्बतें थीं
मगर काँटों में गिनवाए हुए हैं