उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin nazar joDi ja rahi hai to dil kahin toDe ja rahe hain

कहीं नज़र जोड़ी जा रही है तो दिल कहीं तोड़े जा रहे हैं

کہیں نظر جوڑی جا رہی ہے تو دل کہیں توڑے جا رہے ہیں

शायर: Ijtiba Rizvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं नज़र जोड़ी जा रही है तो दिल कहीं तोड़े जा रहे हैं
हमें न छेड़ो हम इन तमाशों को देख कर छोड़े जा रहे हैं

जहाँ है सरसब्ज़ किश्त-ए-अरमाँ उजाड़ सहरा वहाँ रहेगा
उधर को जो बह रही हैं नहरें अब उन के रुख़ मोड़े जा रहे हैं

सुनो कि जिस जिस ने तुम को चाहा उसी ने बोहतान तुम पे बाँधे
क़सम मोहब्बत की तोहमतें कुछ फिर आज हम जोड़े जा रहे हैं

ये रस्म-ए-मय-ख़ाना क्या है आख़िर कोई तो पीर-ए-मुग़ाँ से पूछे
जो कल बनाए गए थे कूज़े वो आज क्यों तोड़े जा रहे हैं

फ़ज़ा में इक दो पहर को गर्मी हवा में इक दो घड़ी को शो'ले
यही निशानी है जलने वालों की हम यही छोड़े जा रहे हैं

सियाह-मस्तों की लग़्ज़िशों पर कब इस से पर्दा पड़ेगा साक़ी
जो रात तोड़े गए वो शीशे सहर को क्या जोड़े जा रहे हैं

नज़र की वो गर्मियाँ भी देखीं अदा की ये झिड़कियाँ भी देखो
जो दिल में डाले गए थे 'रिज़वी' वो आबले तोड़े जा रहे हैं