उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi tawil kabhi muKHtasar bhi hoti hai

कभी तवील कभी मुख़्तसर भी होती है

کبھی طویل کبھی مختصر بھی ہوتی ہے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी तवील कभी मुख़्तसर भी होती है
हर एक रात की लेकिन सहर भी होती है

मुझे अज़ल से मिला एक तो मिज़ाज-ए-जुनूँ
और इक अदा तिरी दीवाना-गर भी होती है

निगाह-ए-यार ने क्या क्या खिला दिए हैं गुल
वही रुलाती वही चारा-गर भी होती है

इताब-ए-दोस्त भी क्यों कर अज़ीज़ हो न मुझे
करम की उस में छुपी इक नज़र भी होती है

'हबीब' आँख से टपकी हुई ये अश्क की बूँद
जिगर का ख़ून कभी ये गुहर भी होती है