उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi gunahon ki mutlaq kafan utar ke aa

कभी गुनाहों की मुतलक़ कफ़न उतार के आ

کبھی گناہوں کی مطلق کفن اتار کے آ

शायर: Chand Akbarabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी गुनाहों की मुतलक़ कफ़न उतार के आ
तू उजली रूह से मैला बदन उतार के आ

जो मेरे वस्ल का एहसास तुझ पे तारी है
किसी के लम्स की सारी छुवन उतार के आ

नई हयात के कपड़े लिए है मौत खड़ी
पुराना ज़िंदगी का पैरहन उतार के आ

नज़र में शर्म हया का भी पास बाक़ी रहे
नज़र की शोख़ियों को गुल-बदन उतार के आ

नई बहार ने पैग़ाम ये हवा को दिया
गुलों के तन से ख़िज़ाँ का कफ़न उतार के आ

हमेशा उड़ते हैं ताइर तिरे तसव्वुर के
कभी तो ज़ेहन से फ़िक्र-ए-सुख़न उतार के आ