उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghalatiyan apni na hon phir bhi manane ka hunar

ग़लतियाँ अपनी न हों फिर भी मनाने का हुनर

غلطیاں اپنی نہ ہوں پھر بھی منانے کا ہنر

शायर: Chand Akbarabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़लतियाँ अपनी न हों फिर भी मनाने का हुनर
इतना आसान नहीं ख़ुद को मिटाने का हुनर

यादों के साँपों को क़ाबू में करूँ कैसे मैं
मैं ने सीखा ही नहीं बीन बजाने का हुनर

मेरे चेहरे की हँसी में पता ख़ुशियों का न ढूँढ
मुद्दतों बा'द मिला दर्द छुपाने का हुनर

मेरे अपनों ने तराशी मेरी 'इज़्ज़त की क़मीस
सब को आता है यहाँ क़ैंची चलाने का हुनर

आग चिंगारी धुआँ कुछ न था दिल फिर भी जला
किस ने सिखलाया तुम्हें ऐसे जलाने का हुनर

इतने सपने न दिखा झूटी अदाकारी छोड़
पत्थरों को न सिखा घास उगाने का हुनर

आँखें चेहरा ज़बाँ सब बे-ज़बाँ हो जाते हैं
जान ले लेगा तिरी राज़ छुपाने का हुनर

क़त्ल करना है अगर जलते हुए सूरज को
सीख लो बर्फ़ की शमशीर बनाने का हुनर