उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi giryan kabhi KHandan kabhi hairan hun main

कभी गिर्यां कभी ख़ंदाँ कभी हैराँ हूँ मैं

کبھی گریاں کبھی خنداں کبھی حیراں ہوں میں

शायर: Kaif Moradaabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी गिर्यां कभी ख़ंदाँ कभी हैराँ हूँ मैं
मुख़्तसर है मिरी रूदाद कि इंसाँ हूँ मैं

सेहन-ए-गुलशन से मिरी ख़ाक-ए-नशेमन न उड़ा
ऐ सबा महरम-ए-असरार-ए-गुलिस्ताँ हूँ मैं

यूँ मुझे दिल से फ़रामोश किए बैठे हैं
जैसे उन का ही कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ हूँ मैं

दे के ग़म आप ने तकमील-ए-जुनूँ भी तो न की
सोचिए कब से यूँ ही चाक-ए-गरेबाँ हूँ मैं

बज़्म-ए-कौनैन में अब तक मह-ओ-ख़ुर्शीद सही
उन की महफ़िल में चराग़-ए-तह-ए-दामाँ हूँ मैं

दिल को उम्मीद-ए-करम रखती है मुज़्तर या'नी
ये भी इक हुस्न-ए-तलब है कि परेशाँ हूँ मैं

मुझ को शर्मिंदा न कर मुझ से इक आँसू भी न माँग
ऐ ग़म-ए-दोस्त बहुत बे-सर-ओ-सामाँ हूँ मैं

ये मिरा हाल है नाला भी नहीं कर सकता
और मिरा ज़र्फ़ भी देखो कि ग़ज़ल-ख़्वाँ हूँ मैं

'कैफ़' इस हाल में हैं आज-कल इंसाँ कि मुझे
शर्म आती है ये कहते हुए इंसाँ हूँ मैं