उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi Darae kabhi KHud hi Darne lagti hai

कभी डराए कभी ख़ुद ही डरने लगती है

کبھی ڈرائے کبھی خود ہی ڈرنے لگتی ہے

शायर: G. R. Vashishth6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी डराए कभी ख़ुद ही डरने लगती है
हयात हरकत-ए-अतफ़ाल करने लगती है

मैं तंग आ के जहाँ से जो देखता हूँ तुझे
मेरी नज़र की थकावट उतरने लगती है

मेरी रगों में लहू शोर बन के दौड़ता है
मेरे लबों पे ख़मोशी ठहरने लगती है

मैं अपने कमरे में सिगरेट पीता रहता हूँ
धुआँ धुआँ तेरी सूरत उभरने लगती है

वो जिस गली से गुज़रता है उस गली की ख़बर
तमाम गलियों से हो कर गुज़र ने लगती है

किसी की रूह को दिल से लगाए रहता हूँ
किसी के जिस्म की चाहत मुकरने लगती है