उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi aankhen kabhi ruKHsar-o-zaqan nochti hai

कभी आँखें कभी रुख़्सार-ओ-ज़क़न नोचती है

کبھی آنکھیں کبھی رخسار و ذقن نوچتی ہے

शायर: Lucky farooqi Hasrat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी आँखें कभी रुख़्सार-ओ-ज़क़न नोचती है
अब मिरी रूह फ़क़त मेरा बदन नोचती है

सुब्ह की चाय में होती है वो तासीर ग़ज़ब
जो गई रात के चेहरे से थकन नोचती है

अपनी मर्ज़ी से तवाइफ़ नहीं बनती औरत
मुफ़्लिसी भूक की जानिब से बदन नोचती है

बाहमी रब्त के जल्वे भी अजब होते हैं
मैं घुटन को तो कभी मुझ को घुटन नोचती है

लोग कहते थे ग़रीबी जिसे सदियों पहले
वो बला आज भी लाशों के कफ़न नोचती है

गर अलावा तिरे आता है किसी और का ख़्वाब
रात भर आँख की पुतली को चुभन नोचती है