उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi aa kar wo agar shakl dikha jata hai

कभी आ कर वो अगर शक्ल दिखा जाता है

کبھی آ کر وہ اگر شکل دکھا جاتا ہے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी आ कर वो अगर शक्ल दिखा जाता है
अह्ल-ए-दुनिया का भला पूछिए क्या जाता है

मोड़ देता है किसी और तरफ़ रू-ए-सुख़न
काम जो इतना ज़रूरी था रहा जाता है

साथ ले जाता है सारी वो मिरी ताब-ओ-तवाँ
रो ही सकता हूँ न फिर मुझ से हँसा जाता है

बात है दिल में कोई और ज़बाँ पर कुछ और
वो किया भी कहीं जाता जो कहा जाता है

धूप जब धूम मचाती है सफ़र में हर-सू
अब्र सा तब मिरे अन्दर कोई छा जाता है

ख़ल्क़ पसमाँदा है और साँस भी लेना मुश्किल
आगे आगे ही कहीं ख़्वाब-ए-हवा जाता है

दश्त-ओ-दर में कहीं ठहराव की सूरत ही नहीं
गर्द उठती है कहीं रंग उड़ा जाता है

रिज़्क़ होता है किसी और के हिस्से का मगर
छीना-झपटी में कोई और ही खा जाता है

वो कहीं तख़्त-नशीं और भी आगे है 'ज़फ़र'
आसमाँ तक तो मिरा दस्त-ए-दु'आ जाता है