उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab zulf-e-dota unki pareshan nahin hai

कब ज़ुल्फ़-ए-दोता उन की परेशान नहीं है

کب زلف دوتا ان کی پریشان نہیں ہے

शायर: Badr Jamali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब ज़ुल्फ़-ए-दोता उन की परेशान नहीं है
कब वहशत-ए-दिल का मिरी सामान नहीं है

यादों को लगाए हुए सीने से गुज़र जा
ये राह-ए-मोहब्बत है कुछ आसान नहीं है

दुनिया में मुझे दौलत-ए-जावेद है हासिल
क्या दिल में मिरे आप का अरमान नहीं है

ऐ बादा-कशो ज़र्फ़ की कुछ बात करो आज
साक़ी का यहाँ आम अब एहसान नहीं है

क्या पूछते हो तमकनत-ए-हुस्न का आलम
अब जैसे करम का कोई इम्कान नहीं है

कुछ रोज़ से हर नेश्तर-ए-ग़म है गवारा
क्या ये निगह-ए-मस्त का एहसान नहीं है

अरमान उमंग हौसला उम्मीद भी इस में
काशाना-ए-दिल दोस्तो वीरान नहीं है

यूँ मिलते हैं मुझ से वो सर-ए-बज़्म 'जमाली'
जैसे मिरी उन से कोई पहचान नहीं है