उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab ye aankhen teri dahliz se chipka sakta

कब ये आँखें तिरी दहलीज़ से चिपका सकता

کب یہ آنکھیں تری دہلیز سے چپکا سکتا

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब ये आँखें तिरी दहलीज़ से चिपका सकता
मैं जो ख़ाशाक-ए-तमाशा नहीं बिखरा सकता

शह्र सारा ही मिरे घर से तिरे घर तक है
एक दीवार नहीं है जिसे मैं ढा सकता

मेरे होंठों पे कोई आग सी खिल उठती कहीं
तेरी आँखों में कोई अब्र सा लहरा सकता

शायद आता किसी पहलू से तुझे भी ये पसंद
मैं जो मल्बूस-ए-मोहब्बत तुझे पहना सकता

तुझे खो देने को तय्यार भी हूँ हर लम्हे
और ये हसरत भी नहीं है कि तुझे पा सकता

यूँ भी हर रोज़ तिरी दीद की 'आदत थी इसे
आँख अब दिल तो नहीं है जिसे बहला सकता