उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab talak baiTha rahega ye jahan dar par mere

कब तलक बैठा रहेगा ये जहाँ दर पर मिरे

کب تلک بیٹھا رہے گا یہ جہاں در پر مرے

शायर: Om Prabhakar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब तलक बैठा रहेगा ये जहाँ दर पर मिरे
और कितने दिन रहेगा आसमाँ सर पर मिरे

मो'जिज़ा क़िस्मत का है या है ये हाथों का हुनर
आ गिरा मेरा जिगर ही आज नश्तर पर मिरे

छटपटाता है बेचारा रेग-ज़ारों से घिरा
कोई तो दस्त-ए-करम होता समुंदर पर मिरे

जो जहाँ पर है वहीं पर घुल रहा है दिन-ब-दिन
छा गई है बे-हिसी की गर्द मंज़र पर मिरे

गो कि रखता हूँ मैं दुश्मन से हिफ़ाज़त के लिए
नाम तो मेरा मगर लिक्खा है ख़ंजर पर मिरे

ढूँढता फिरता हूँ अपना घर मैं शह्र-ए-ख़्वाब में
रात फिर सोता है कोई और बिस्तर पर मिरे