उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab hawa muTThi mein aati hai abas dauDa kiya

कब हवा मुट्ठी में आती है अबस दौड़ा किया

کب ہوا مٹھی میں آتی ہے عبث دوڑا کیا

शायर: Jafar Raza8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब हवा मुट्ठी में आती है अबस दौड़ा किया
जाने क्या क्या कल यूँही मैं रात-भर सोचा किया

अब तो इस तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ में मुझे भी लुत्फ़ है
जो किया तुम ने मिरी ख़ातिर बहुत अच्छा किया

जैसे वो भी फ़लसफ़े के नुक्ता-ए-पेचीदा हों
मेरी बातें मेरे बदले ग़ैर से समझा किया

फिर मुझे दरयाफ़्त करने की उसे हसरत रही
वो मुझे दीमक लगे औराक़ में ढूँढा किया

ख़ू में चाहे तुंद हो दिल से निहायत नेक है
भूल कर सब पिछली बातें मेरे पास आया किया

तिश्नगी मेरा मुक़द्दर है मुझे पानी से क्या
जानता था फिर भी ख़ेमा नहर पर बरपा किया

कल वही शब थी जो आती है नसीबों से मगर
और सब सोते रहे बस एक मैं जागा किया

जब नई आवाज़ उट्ठी क़त्ल करने आए लोग
इक मदारी साँप का सर मान कर कुचला किया