उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab hai had-e-imkani mein

कब है हद-ए-इम्कानी में

کب ہے حد امکانی میں

शायर: Hafeez Banarasi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब है हद-ए-इम्कानी में
रिश्ता आग और पानी में

उस का सरापा लिक्खूंगा
आज क़लम है रवानी में

छोटा मिरा किरदार सही
शामिल तो हूँ कहानी में

मेरे माथे पर ये शिकन
उस ने दी है निशानी में

आईना है ज़ुल्म तिरा
मेरी कर्ब-बयानी में

दाना करते हैं जो काम
मैं ने किए नादानी में

चोरी मेरे दिल की हुई
आँखों की निगरानी में

बाप की दुश्वारी के तुफ़ैल
बच्चे हैं आसानी में

मशवरा उन का माना नहीं
मारे गए मन-मानी में

काग़ज़ की है नाव 'हबीब'
सीना-सिपर तुग़्यानी में