उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup ko chhanw likhun sang ko shisha likkhun

धूप को छाँव लिखूँ संग को शीशा लिक्खूँ

دھوپ کو چھاؤں لکھوں سنگ کو شیشہ لکھوں

शायर: Hafeez Banarasi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप को छाँव लिखूँ संग को शीशा लिक्खूँ
मस्लहत का है तक़ाज़ा तुझे अच्छा लिक्खूँ

कौन है मेरी तबाही का सबब क्या लिखूँ
मेरा ख़ामा है ब-ज़िद नाम तुम्हारा लिक्खूँ

जुस्तुजू मेरी सफ़र ही में रहेगी कब तक
अब तो मिल जाए कोई जिस को मैं अपना लिक्खूँ

बे-ग़रज़ मुझ पे नहीं करते करम अहल-ए-करम
और ग़रज़ ये है कि मैं उन का क़सीदा लिक्खूँ

मैं ने बेचा है न बेचूँगा कभी अपना ज़मीर
ग़ैर मुमकिन है कि क़तरे को मैं दरिया लिक्खूँ

ख़ुद उभर आएगी क़िर्तास पे नायाब ग़ज़ल
रू-ब-रू बैठ कि मैं तेरा सरापा लिक्खूँ

अपने माज़ी का क़सीदा तो बहुत लिक्खा 'हबीब'
दिल में आता है कि अब हाल का नौहा लिक्खूँ