उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gumrah kah ke pahle jo mujhse KHafa hue

गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए

گمراہ کہہ کے پہلے جو مجھ سے خفا ہوئے

शायर: Hafeez Banarasi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए
आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए

अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई
तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए

ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा
तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए

मेरी नज़र ने तुम को जमाल-आशना किया
मुझ को दु'आएँ दो कि तुम इक आइना हुए

क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी
मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए

अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी
वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए

सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़यारत है आज कल
वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए

वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए
लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए

कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़'
कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए