उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab baat ho baghair KHushamad wahan durust

कब बात हो बग़ैर ख़ुशामद वहाँ दुरुस्त

کب بات ہو بغیر خوشامد وہاں درست

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब बात हो बग़ैर ख़ुशामद वहाँ दुरुस्त
वो ना-दुरुस्त भी जो कहें कहिए हाँ दुरुस्त

थोड़े से दिन बहार के हैं किस उमीद पर
करते हैं अपने मुर्ग़-ए-चमन आशियाँ दुरुस्त

कुछ मैं भी अपना हाल-ए-तबीअत बयाँ करूँ
गर हो मिज़ाज आप का ऐ मेहरबाँ दुरुस्त

उस को दुरुस्ती-ए-दिल-ए-आशिक़ से क्या ग़रज़
जिस बद-ज़बान की नहीं अब तक ज़बाँ दुरुस्त

आँखों में रह कि दिल में ठहर तेरे वास्ते
आरास्ता हर एक मकाँ हर मकाँ दुरुस्त

हर रोज़ ताज़ियाना-ए-ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से
तू ने भी दिल को ख़ूब किया मेरी जाँ दुरुस्त

आता है सामने जो वो ग़ारत-गर-ए-शकेब
औसान 'दाग़' रहते हैं अपने कहाँ दुरुस्त