उर्दू शायरी · ग़ज़ल

junun-e-shauq ka hasil na tum samjhe na hum samjhe

जुनून-ए-शौक़ का हासिल न तुम समझे न हम समझे

جنون شوق کا حاصل نہ تم سمجھے نہ ہم سمجھے

शायर: Kaif Moradaabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जुनून-ए-शौक़ का हासिल न तुम समझे न हम समझे
कहाँ दोनों की है मंज़िल न तुम समझे न हम समझे

डुबोना चाहती थीं जो भी हम दोनों की कश्ती को
उन्हीं मौजों में था साहिल न तुम समझे न हम समझे

तमन्नाओं के तूफ़ानों ने फ़ुर्सत ही न मिलने दी
मक़ामात-ए-निगाह-ओ-दिल न तुम समझे न हम समझे

मोहब्बत ने कुछ ऐसा हौसला बख़्शा था दोनों को
किसी मुश्किल को भी मुश्किल न तुम समझे न हम समझे

शदीद एहसास-ए-क़ुर्बत से जहाँ मदहोश थे हम तुम
वहीं था इम्तिहान-ए-दिल न तुम समझे न हम समझे

मोहब्बत सिर्फ़ इज़हार-ए-मोहब्बत को नहीं कहते
फ़रेब-ए-सई-ए-ला-हासिल न तुम समझे न हम समझे

वफ़ा का अहद कैसी सादगी के साथ कर बैठे
वफ़ा है किस क़दर मुश्किल न तुम समझे न हम समझे

सभी बेगाना थे ज़ाहिर में हम दोनों की हालत से
मगर कोई न था ग़ाफ़िल न तुम समझे न हम समझे

वो कहते हैं हमें भी 'कैफ़' रुस्वा कर दिया तुम ने
मगर रुस्वाई का हासिल न तुम समझे न हम समझे